

कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में एक नाबालिग लड़की का नाम बदलने की इजाज़त देने से सिविल कोर्ट के इनकार को रद्द कर दिया और ज्योतिषीय व अंक-ज्योतिष संबंधी कारणों से उसके और उसके परिवार द्वारा चुने गए नाम को बदलने की मंज़ूरी दे दी।
जस्टिस हंचटे संजीवकुमार ने कहा कि हर भारतीय का यह नागरिक अधिकार है कि उसे उसके नाम से पहचाना जाए और इसलिए, लोग नाम बदलने के लिए सिविल कोर्ट जा सकते हैं।
कोर्ट ने कहा, "समाज में हर व्यक्ति की पहचान उसके नाम से ही होती है। भारत के हर नागरिक का यह नागरिक अधिकार है कि उसे उसके नाम से पहचाना जाए। इसलिए, नाम में सुधार या बदलाव के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया जा सकता है, क्योंकि यह नागरिक अधिकार के निर्णय से जुड़ा मामला है।"
इस मामले में, कोर्ट ने यह भी गौर किया कि नाम बदलने पर किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी और इससे किसी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं होगा।
कोर्ट एक नाबालिग लड़की की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसे उसके पिता ने दायर किया था। जन्म के समय उसका नाम 'लक्ष्मी' रखा गया था। हालांकि, बाद में उसके माता-पिता ने उसका नाम बदलकर 'वीणा' करने का फैसला किया, क्योंकि उनका मानना था कि इस नाम से ज़्यादा खुशहाली आएगी।
इसलिए, लड़की ने अपने पिता (वादी) के ज़रिए एक सिविल केस दायर किया और मांग की कि उसके नाम को 'वीणा' घोषित किया जाए। लेकिन सिविल कोर्ट ने केस खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना था कि ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि उसका नाम बदलकर 'वीणा' किया जाना चाहिए, और न ही माता-पिता ने नाम बदलने के लिए सबसे पहले उस स्कूल से संपर्क किया था जहाँ वह पढ़ती थी।
इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। वादी ने बताया कि कर्नाटक सरकार का एक सर्कुलर था जिसमें कहा गया था कि नाम बदलने के लिए सिविल कोर्ट का आदेश ज़रूरी है। वादी ने अखबारों में नाम बदलने के प्रस्ताव के बारे में जारी सार्वजनिक सूचनाएं भी कोर्ट में पेश कीं।
हाई कोर्ट ने वादी को राहत दी। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह गलती की थी कि उसने इस बात का दस्तावेज़ी सबूत मांगा कि लड़की का नाम 'वीणा' है, जबकि केस नाम बदलने के लिए दायर किया गया था, न कि नाम में सुधार के लिए।
कोर्ट ने कहा, "ट्रायल कोर्ट का यह तर्क सही नहीं है, क्योंकि वादी का यह कहना नहीं है कि शुरुआत में स्कूल में दाखिले के समय उसका नाम गलती से 'लक्ष्मी एन.' लिखा गया था। वादी बस यह चाहती है कि उसे 'वीणा एन.' कहा जाए, न कि 'लक्ष्मी एन.'। इसलिए, 'वीणा एन.' नाम दिखाने वाला कोई दस्तावेज़ पेश करने की ज़रूरत ही नहीं थी।"
हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़की को उसके नए नाम से पहचाने जाने की मंज़ूरी देने के लिए निर्देश जारी किए।
वादी पक्ष की ओर से वकील संपत कुमार ए.वी. पेश हुए।
राज्य की ओर से अतिरिक्त सरकारी वकील वी. शेषु पेश हुए।
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