

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में FIR दर्ज करने और CBI या SIT से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस अमित बंसल ने याचिकाकर्ता एडवोकेट घनश्याम उपाध्याय के अधिकार (लोकस) पर सवाल उठाया और कहा कि उनके पास दिल्ली पुलिस और फिर सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का दूसरा रास्ता मौजूद है।
कोर्ट ने टिप्पणी की, "सर, मैं इस मामले पर सुनवाई नहीं कर रहा हूँ। यह बिना किसी ठोस आधार के की जा रही कार्रवाई (विच हंट) है। क्या आपके पास करने के लिए कोई बेहतर काम नहीं है?"
उपाध्याय खुद कोर्ट में पेश हुए और दलील दी कि यह मामला "असाधारण प्रकृति" का है और मजिस्ट्रेट इसके साथ न्याय करने में सक्षम नहीं होंगे।
उपाध्याय ने कहा, "वह [मजिस्ट्रेट] CBI या SIT जांच का आदेश नहीं दे सकते। मजिस्ट्रेट या विशेष अदालत इस मामले को देखने में सक्षम नहीं होंगे।"
केंद्र सरकार के वकील (CGSC) प्रेमतोष कुमार मिश्रा भारत सरकार और CBI की ओर से पेश हुए और कहा कि उपाध्याय पहले सुप्रीम कोर्ट जा चुके हैं और शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
मिश्रा ने आगे कहा कि उपाध्याय के पास इस मामले को उठाने का कोई अधिकार (लोकस) नहीं है और उनके पास अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पुलिस और उसके बाद सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का दूसरा रास्ता मौजूद है।
मामले पर विचार करने के बाद, कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता उचित कानूनी रास्ता अपना सकते हैं।
उपाध्याय ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर FIR दर्ज करने और मार्च 2025 में लगी आग के बाद जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने और बाद में उसे हटाए जाने की घटना की स्वतंत्र जांच की मांग की थी।
उन्होंने इस नकदी के स्रोत, मालिकाना हक, कस्टडी और गायब होने के साथ-साथ सबूतों को ज़ब्त न करने और सुरक्षित न रखने के आरोपों की CBI या किसी स्वतंत्र SIT से जांच की मांग की।
याचिका के अनुसार, 14-15 मार्च 2025 की रात नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम/आउटहाउस में आग लग गई थी। इसमें दावा किया गया है कि आग बुझाने और पुलिस की कार्रवाई के दौरान जली हुई और आंशिक रूप से जली हुई नकदी देखी गई थी और उसकी तस्वीरें व वीडियो भी बनाए गए थे।
याचिका में कहा गया है कि एक इन-हाउस कमेटी और बाद में जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत गठित एक वैधानिक कमेटी ने मामले की जांच की थी और 12 अगस्त 2026 को संसद में पेश की गई वैधानिक कमेटी की रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप सही पाए गए थे।
गौरतलब है कि 2 जून 2026 को शिकायत के बाद भी FIR दर्ज न होने पर उपाध्याय पहले सुप्रीम कोर्ट गए थे। याचिका के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 7 अगस्त को आरोपों के गुण-दोष पर विचार किए बिना ही आर्टिकल 32 के तहत दायर याचिका को खारिज कर दिया था।
वैधानिक कमेटी की रिपोर्ट के बाद याचिकाकर्ता ने 17 अगस्त को एक नई शिकायत दर्ज कराई थी।
याचिका में तर्क दिया गया है कि चूंकि इसमें संवैधानिक अदालत के एक पूर्व जज और सरकारी अधिकारियों की कथित लापरवाही शामिल है, इसलिए इस मामले की विशेष संवैधानिक जांच होनी चाहिए।
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"Wild witch hunt": Delhi High Court rejects plea for CBI probe into Justice Yashwant Varma episode