

कलकत्ता हाई कोर्ट ने हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार को चाय बागान के एक कर्मचारी को ₹5.36 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। इस कर्मचारी को ज़मानत पर रिहा किए जाने के बाद भी 60 और दिनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया था।
जस्टिस देबांग्सु बसाक और जस्टिस आर्यक दत्त की डिवीज़न बेंच ने आरोपी वर्कर की रिहाई की मांग वाली 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका पर यह फैसला सुनाया।
5 अक्टूबर के फैसले में कहा गया, "हमारा मानना है कि 6 अगस्त, 2018 से 5 अक्टूबर, 2018 के बीच रिट याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने को कानून की मंज़ूरी नहीं थी। इसलिए, रिट याचिकाकर्ता इस अवधि के लिए मुआवज़े का हकदार है।"
मज़दूर (याचिकाकर्ता) पर तीन आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन उसे सभी मामलों में ज़मानत मिल गई थी और उसे 6 अगस्त, 2018 को जेल से रिहा किया जाना था। हालाँकि, उसे तुरंत रिहा नहीं किया गया, जिसके कारण उसने रिहाई के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की। बाद में उसे 5 अक्टूबर, 2018 को रिहा किया गया, जो उसकी ज़मानत पर रिहाई की तय तारीख से लगभग 2 महीने बाद था।
उसके वकील ने हाई कोर्ट को बताया कि वह उस 60 दिन की अवधि के लिए ₹20 लाख के मुआवज़े का हकदार था, जिसके दौरान उसे गैर-कानूनी रूप से हिरासत में रखा गया था। इस दावे के समर्थन में, वकील ने गैर-कानूनी हिरासत की अवधि के दौरान याचिकाकर्ता की नौकरी छूटने और पुलिस हिरासत में उसकी लंबी और गैर-कानूनी हिरासत के कारण उसे हुई मानसिक परेशानी और तकलीफ़ का हवाला दिया।
कोर्ट ने गौर किया कि राज्य की ओर से इस बात का शायद ही कोई स्पष्टीकरण दिया गया कि ज़मानत मिलने के बाद भी याचिकाकर्ता को जेल में क्यों रखा गया।
कोर्ट ने देखा कि एक आरोप था कि शांति बनाए रखने के लिए भरे गए बॉन्ड का याचिकाकर्ता ने उल्लंघन किया था, जिसके कारण एक 'मिसलेनियस रिकॉर्ड केस' (MR केस) दर्ज किया गया था। राज्य का दावा था कि याचिकाकर्ता इस MR केस के सिलसिले में 5 अक्टूबर, 2018 तक हिरासत में रहा।
हालाँकि, कोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं था।
कोर्ट ने कहा, "राज्य का यह तर्क संतोषजनक नहीं पाया गया कि MR केस नंबर 780/2018 के संबंध में याचिकाकर्ता को पेश करने के उद्देश्य से उसकी हिरासत ज़रूरी थी।"
इसलिए, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता अपनी 60 दिन की गैर-कानूनी हिरासत के लिए मुआवज़ा पाने का हकदार है। हालाँकि, कोर्ट की राय थी कि याचिकाकर्ता को मुआवज़ा देने के लिए ₹5.36 लाख की राशि पर्याप्त थी, न कि ₹20 लाख की दावा की गई राशि।
कोर्ट ने कहा, “हम (नौकरी छूटने के लिए दिए गए ₹36,000 के अलावा) ₹5 लाख का मुआवज़ा तय करते हैं। इस तरह, कुल मिलाकर हम रिट याचिकाकर्ता को गैर-कानूनी हिरासत में रखे जाने की अवधि के लिए राज्य की ओर से ₹5,36,000 का मुआवज़ा देने का आदेश देते हैं।”
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मुआवज़े का भुगतान आदेश की तारीख से चार हफ़्ते के भीतर किया जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील अभिमन्यु बनर्जी, अर्नब साहा और अब्दुल नोमान पेश हुए।
राज्य की ओर से अतिरिक्त सरकारी वकील दिबाशीष बसु और वकील स्नेहा दत्ता तथा पूर्णेंदु दास पेश हुए।
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