

कलकत्ता हाईकोर्ट ने बच्चों के खाने के एक प्रोडक्ट में कीड़ा मिलने के आरोपों को लेकर मीड जॉनसन इंडिया के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है [शैलेश वेंकटेशन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य]।
कोर्ट ने कहा कि अगर कंपनी को खुद आरोपी नहीं बनाया गया है, तो इंडियन पीनल कोड (IPC) के तहत कॉर्पोरेट डायरेक्टरों को 'विकेरियस लायबिलिटी' (किसी और के काम के लिए ज़िम्मेदारी) के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस चैताली चटर्जी दास की सिंगल-जज बेंच ने कहा कि IPC में 'ऑटोमैटिक विकेरियस लायबिलिटी' का कोई प्रावधान नहीं है।
कोर्ट ने कहा, "जब कंपनी अपराधी हो, तो इस बारे में किसी कानूनी प्रावधान के बिना डायरेक्टरों पर अपने-आप 'विकेरियस लायबिलिटी' नहीं थोपी जा सकती। जिस व्यक्ति ने कंपनी की ओर से अपराध किया है, उसे कंपनी के साथ आरोपी बनाया जा सकता है, अगर इस बात के पर्याप्त सबूत हों कि अपराध में उसकी सक्रिय भूमिका थी और उसका इरादा भी आपराधिक था।"
यह मामला नवंबर 2015 में एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई निजी शिकायत से शुरू हुआ था। महिला का दावा था कि उसे बेबी फ़ॉर्मूला (एनफैमिल A+ स्टेज 3 फ़ॉलो-अप इन्फ़ैंट फ़ॉर्मूला) के एक डिब्बे में काले धूल के कण (फफूंद) और एक ज़िंदा कीड़ा मिला था।
शुरुआत में FIR बनाने वाली कंपनी 'मीड जॉनसन' और रिटेल फ़ार्मेसी 'मेडप्लस' के ख़िलाफ़ दर्ज की गई थी, लेकिन पुलिस की जांच छह साल तक चलती रही।
जब पुलिस ने आख़िरकार सितंबर 2021 में अपनी चार्जशीट दाखिल की, तो उन्होंने आरोपियों की सूची से कंपनी का नाम हटा दिया और मैनेजिंग डायरेक्टर को व्यक्तिगत रूप से 'आरोपी नंबर 3' बनाया।
इसके बाद डायरेक्टर ने हाईकोर्ट में एक अर्ज़ी दायर करके FIR और उसके बाद 2021 में अलीपुर के चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में प्रक्रिया से जुड़ी कई गंभीर कमियों को उजागर करते हुए इस याचिका को मंज़ूरी दे दी।
रामनाथ बनाम यूपी राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के अहम फ़ैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि 'फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006' (FSS एक्ट) एक विशेष कानून है जो खाद्य गुणवत्ता और मिलावट से संबंधित भारतीय दंड संहिता (IPC) की सामान्य धाराओं, जैसे धारा 272 और 273, पर पूरी तरह से हावी है।
जस्टिस चटर्जी ने कहा कि FSS एक्ट की धारा 42 के तहत, मुक़दमा शुरू करने का अधिकार पूरी तरह से फ़ूड सेफ़्टी ऑफ़िसर जैसे वैधानिक अधिकारियों के पास है। इसका मतलब है कि सामान्य पुलिस अधिकारियों के पास FIR दर्ज करने या चार्जशीट दाखिल करने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं था।
इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि FSS एक्ट की धारा 77 के तहत यह कार्यवाही समय-सीमा के कारण पूरी तरह से वर्जित थी। यह धारा स्पष्ट रूप से अदालतों को अपराध होने के एक साल बाद उसका संज्ञान लेने से रोकती है।
इस मामले में, कोर्ट ने पाया कि चूंकि कथित घटना के छह साल बाद चार्जशीट दाखिल की गई थी, इसलिए अभियोजन पक्ष का मामला समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण बाधित था।
बेंच ने इस बात पर भी सहमति जताई कि पुलिस की इस अत्यधिक देरी के कारण उत्पाद की "बेस्ट बिफोर" (इस्तेमाल की अंतिम तारीख) अवधि समाप्त हो गई। इससे निर्माता का प्रयोगशाला में दोबारा परीक्षण की मांग करके उत्पाद की गुणवत्ता का बचाव करने का महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार भी खत्म हो गया।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मजिस्ट्रेट ने बिना सोचे-समझे और यांत्रिक तरीके से चार्जशीट का संज्ञान लिया था। हाई कोर्ट ने यह मानते हुए कि कार्यवाही जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, डायरेक्टर के खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और जारी किए गए समन को रद्द कर दिया।
याचिकाकर्ता (डायरेक्टर) की ओर से सीनियर एडवोकेट सुदीप्त सरकार और एडवोकेट आर. जवाहर लाल, एस. प्रसाद, दीपायन दान और मेघना कुमार पेश हुए।
राज्य की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर देबाशीष रॉय और एडवोकेट सरयाति दत्ता व के. रॉय पेश हुए।
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