कुणाल कामरा ने विधायी विशेषाधिकारों की सीमाओं से जुड़े 7 जजों की बेंच वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

कामरा ने 'एन रवि बनाम स्पीकर' मामले में दखल देने की मांग की है, जिसमें कोर्ट अभिव्यक्ति की आज़ादी और विधायी विशेषाधिकारों के बीच के आपसी संबंध की जांच करेगा।
Kunal Kamra and Supreme Court
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कॉमेडियन कुणाल कामरा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। वे कोर्ट की सात जजों वाली बेंच के सामने चल रहे एक मामले में दखल देना चाहते हैं। यह मामला इस बात से जुड़ा है कि नागरिकों की बोलने की आज़ादी को सीमित करने के लिए विधायी विशेषाधिकारों का इस्तेमाल किस हद तक किया जा सकता है।

कामरा ने 'एन रवि और अन्य बनाम स्पीकर, लेजिस्लेटिव असेंबली, चेन्नई' मामले में पक्षकार बनने की अनुमति मांगी है। इस मामले में कोर्ट विधायी विशेषाधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी तथा जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के बीच के संबंधों की जांच करेगा।

कामरा ने यह याचिका इसलिए दायर की क्योंकि उनके कॉमेडी शो 'नया भारत' में बजाए गए एक व्यंग्यात्मक गाने को लेकर महाराष्ट्र विधानसभा में उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही चल रही है।

कामरा की व्यंग्यात्मक प्रस्तुति 2022 में शिवसेना पार्टी के बंटवारे पर आधारित थी, जिसके कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को इस्तीफा देना पड़ा और अंततः एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में राज्य में नई सरकार बनी। खबरों के अनुसार, अपने गाने में कामरा ने शिंदे को 'गद्दार' भी कहा था।

इस वजह से, उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा में विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही का सामना करना पड़ा क्योंकि उन पर शिंदे का अनादर और अपमान करने का आरोप लगाया गया था।

उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला भी दर्ज किया गया था। कामरा ने बॉम्बे हाई कोर्ट में आपराधिक मामले को रद्द करने के लिए पहले ही याचिका दायर कर दी है, जिसने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है, लेकिन मामले में अभी तक अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।

अब कामरा ने विधायी विशेषाधिकार की सीमाओं के व्यापक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी बात रखने की अनुमति मांगी है।

उनकी याचिका में कहा गया है, "याचिकाकर्ता का मानना ​​है कि उनका मामला यह दिखाता है कि विधायी विशेषाधिकारों का इस्तेमाल न केवल प्रेस के सदस्यों की अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रभावित करता है, बल्कि किसी भी ऐसे नागरिक की आज़ादी को भी प्रभावित करता है जो विधायिका के सदस्यों के कार्यों के बारे में बात करना चाहता है।"

वे आगे तर्क देते हैं कि यदि इस तरह से विधायी विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया जाता है, तो इसका पूरे भारत में नागरिकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बुरा असर पड़ेगा।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही के कारण मुंबई में उनके शो के लिए जगह मिलना भी मुश्किल हो गया है, और अगर वे भारत में किसी भी विधायिका के किसी सदस्य के कार्यों पर टिप्पणी करते हैं, तो उन्हें इसी तरह की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है।

याचिका में आगे कहा गया है, "यह चिंताजनक है कि संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल ऐसी बातचीत और टिप्पणी को हतोत्साहित करने के लिए किया जा सकता है जो चुने हुए प्रतिनिधियों के कार्यों से संबंधित हो।"

यह याचिका वकील आरती राघवन ने तैयार की थी और इसे वकील मानसी बिंजराजका के ज़रिए दायर किया गया था।

'एन रवि बनाम स्पीकर' मामला, जिसमें कामरा दखल देना चाहते हैं, तमिलनाडु विधानसभा के 2003 के उस प्रस्ताव से जुड़ा है जिसमें 'द हिंदू' के सीनियर पत्रकारों को गिरफ़्तार करने की बात कही गई थी। विशेषाधिकार की कार्यवाही 'द हिंदू' के एक संपादकीय लेख को लेकर शुरू की गई थी, जिसमें राज्य सरकार - उस समय AIADMK नेता जे. जयललिता के नेतृत्व में - की 'बढ़ती असहिष्णुता' की आलोचना की गई थी।

सदन ने विधायी विशेषाधिकार के उल्लंघन और अवमानना ​​के लिए एडिटर एन रवि, एग्जीक्यूटिव एडिटर मालिनी पार्थसारथी, पब्लिशर एस. रंगराजन, ब्यूरो चीफ वी. जयंत और स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट राधा वेंकटेशन को 15 दिन की जेल की सज़ा देने का प्रस्ताव पारित किया था।

हालांकि गिरफ़्तारी वारंट जारी किए गए थे, लेकिन पत्रकारों को अंततः गिरफ़्तार नहीं किया गया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी किसी भी कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

8 दिसंबर, 2003 को पारित एक आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में कानून के अहम सवाल शामिल हैं, जैसे कि संविधान के अनुच्छेद 194 (3) की व्याख्या और अनुच्छेद 19 (1)(a) (अभिव्यक्ति की आज़ादी) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के साथ इसके संबंध।

इसलिए, मामले को पांच जजों की बेंच के पास भेजा गया। हालांकि, अगले साल (2004) कोर्ट ने मामले को सात जजों की बेंच के पास भेजने का फ़ैसला किया, क्योंकि संबंधित मुद्दों पर पांच जजों की बेंच के फ़ैसले और सात जजों की बेंच के फ़ैसले के बीच टकराव लग रहा था।

उस समय कोर्ट ने सीनियर वकील हरीश साल्वे (जो उस समय 'द हिंदू' के पत्रकारों के वकील थे) की इस बात पर भी ध्यान दिया कि इस मुद्दे के बहुत व्यापक असर हैं और इसे आधिकारिक तौर पर सुलझाया जाना चाहिए।

यह मामला, जो अब सात जजों की बेंच के सामने लिस्टेड है, 6 अक्टूबर को सुना जाना है, और कोर्ट 15 अक्टूबर तक बहस पूरी करने का इरादा रखता है।

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Kunal Kamra moves Supreme Court in 7-judge bench case on limits of legislative privileges

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