

कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को आनंदबाज़ार पत्रिका (ABP) के एडिटर और एक पत्रकार को अंतरिम राहत दी। यह राहत उन्हें अखबार की एक न्यूज़ हेडलाइन में "गेरुआ गुंडागर्मी" (Saffron Hooliganism) शब्द के इस्तेमाल को लेकर दर्ज FIR के मामले में किसी भी सख्त कार्रवाई से बचने के लिए दी गई है [ईशानी दत्ता रे और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य]।
अखबार ने 20 अगस्त को जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुई हिंसा के बारे में बताने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था।
जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने आरोपियों को अंतरिम राहत दी। उन्होंने देखा कि पत्रकार जांच के दौरान जारी नोटिस के जवाब में पुलिस के सामने पेश हुए थे और उन्होंने नोटिस का पालन भी किया था।
सुनवाई के दौरान, राज्य ने यह भी कहा कि पत्रकारों से कस्टडी में पूछताछ करने की ज़रूरत नहीं है।
इन बातों पर ध्यान देते हुए, कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे कोई ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई न करें।
कोर्ट ने कहा, "संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे 15 दिसंबर, 2026 तक या अगले आदेश तक (जो भी पहले हो) याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई न करें। याचिकाकर्ता (पत्रकार) जांच में सहयोग करेंगे और अगर भविष्य में उक्त आपराधिक मामले के संबंध में कोई नोटिस जारी किया जाता है, तो उसका पालन करेंगे।"
यह FIR आनंदबाज़ार पत्रिका की उस रिपोर्ट के आधार पर दर्ज की गई थी जिसमें 19-20 अगस्त को जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुई हिंसा के बारे में बताया गया था।
इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी फैकल्टी के स्टूडेंट यूनियन की आम बैठक के दौरान ABVP और वामपंथी विचारधारा वाले छात्र समूहों के बीच झड़प हुई थी, जिसमें कई छात्र घायल हो गए थे। विरोधी समूहों ने हिंसा के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराया और आरोप लगाया कि दूसरी तरफ़ के लोगों ने बाहरी लोगों को कैंपस में बुलाया था।
घटना पर 21 अगस्त की अपनी रिपोर्ट में, ABP ने "गेरुआ गुंडागर्दी" (भगवा गुंडागर्दी) हेडलाइन का इस्तेमाल किया था।
बाद में एक शिकायत में "गुंडागर्दी" के साथ "गेरुआ" शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई गई और आरोप लगाया गया कि इससे हिंदुओं की भावनाएं आहत हुईं। 28 अगस्त को बोबाज़ार पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई।
इसके बाद पत्रकार हाई कोर्ट पहुंचे, उन्होंने आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी और पुलिस की सख़्त कार्रवाई से सुरक्षा की मांग की।
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान, पत्रकारों की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि शिकायत सिर्फ़ हेडलाइन के बारे में थी और न्यूज़ रिपोर्ट के कंटेंट के बारे में कोई शिकायत नहीं की गई थी।
उन्होंने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196 के लागू होने पर भी सवाल उठाया, जो अलग-अलग समूहों के बीच अशांति या दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित है। वकील ने तर्क दिया कि शिकायत में दो या दो से ज़्यादा समूहों के बीच दुश्मनी का ज़रूरी आरोप शामिल नहीं था।
हालांकि, कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि वह यह तय नहीं कर रहा है कि इस मामले में धारा 196 लागू होती है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि जांच पूरी करते समय यह सवाल जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में आएगा।
गौर करने वाली बात है कि यह मामला इस महीने की शुरुआत में हाई कोर्ट के सामने आया था।
3 सितंबर को, राज्य सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिलाया था कि पत्रकारों के ख़िलाफ़ कोई सख़्त कार्रवाई नहीं की जाएगी, बशर्ते वे जांच एजेंसी द्वारा जारी नोटिस का पालन करें।
गुरुवार को कोर्ट ने देखा कि पत्रकारों ने BNSS की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस का पालन किया है, और FIR में लगाए गए आरोपों के लिए सात साल से कम सज़ा का प्रावधान है।
इसके बाद कोर्ट ने पत्रकारों को जांच में सहयोग जारी रखने और आगे मिलने वाले किसी भी नोटिस का पालन करने का निर्देश दिया। अगर वे सहयोग नहीं करते हैं, तो राज्य को कोर्ट जाने और सुरक्षा में बदलाव या उसे रद्द करने की मांग करने की छूट दी गई।
इस मामले की अगली सुनवाई 1 दिसंबर को होगी।
पत्रकार की ओर से सीनियर एडवोकेट SN मुखर्जी और संदीपन गांगुली के साथ-साथ एडवोकेट अरुणाभ देब, दीपांशु कुमार सरकार, आशिका डागा, मातृ प्रसाद दास और संपूर्ण मुखर्जी पेश हुए।
पश्चिम बंगाल राज्य का प्रतिनिधित्व एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) राजदीप मजूमदार ने किया, जिनके साथ एडवोकेट मयूख मुखर्जी और सायन मुखर्जी भी मौजूद थे।
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Calcutta High Court grants relief to ABP editor, journalist in FIR over ‘Gerua Gundami’ headline