

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले किसी व्यक्ति पर महिला के साथ क्रूरता करने के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, अगर वह रिश्ता शादी जैसा था और दोनों पक्षों का एक-दूसरे से शादी करने का इरादा था। [लोकेश बनाम कर्नाटक राज्य]
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने फैसला सुनाया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A ऐसे रिश्तों पर भी लागू होगी, भले ही कानूनी रूप से वैध शादी न हुई हो।
कोर्ट ने कहा, "धारा 498A उन लिव-इन रिश्तों पर लागू होती है जो शादी जैसे रिश्ते माने जाते हैं, और जिनमें शादी करने का इरादा उस रिश्ते का एक अहम हिस्सा होता है।"
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि हर लिव-इन रिश्ते पर यह दंडात्मक प्रावधान लागू नहीं होगा। यह साबित करने की शुरुआती ज़िम्मेदारी उस महिला की होगी जो कानून के तहत सुरक्षा चाहती है और यह दिखाना चाहती है कि दोनों पक्षों का शादी करने का इरादा था।
इस फ़ैसले की कॉपी अभी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
यह फ़ैसला डॉ. लोकेश बीएच और अन्य लोगों की उस अपील पर आया, जिसमें उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट के नवंबर 2025 के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके ख़िलाफ़ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
यह मामला एक महिला की शिकायत से शुरू हुआ था, जिसने आरोप लगाया था कि लोकेश ने अपनी पहली शादी के बारे में बताए बिना उससे शादी की थी। उसने लोकेश और उसके रिश्तेदारों पर दहेज के लिए परेशान करने, क्रूरता करने और उसे आग लगाने की कोशिश करने का आरोप लगाया था।
लोकेश ने तर्क दिया कि कथित दूसरी शादी अमान्य थी और इसलिए, धारा 498A के तहत उसे महिला का "पति" नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि यह प्रावधान अमान्य या रद्द की जा सकने वाली शादियों के साथ-साथ शादी जैसे लिव-इन रिश्तों पर भी लागू हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यापक निष्कर्ष की पुष्टि की, लेकिन शादी करने के इरादे के सबूत की शर्त जोड़कर इसे स्पष्ट किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 498A को पतियों और उनके रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं के प्रति बुरे व्यवहार को रोकने के लिए लाया गया था। इसका बड़ा मकसद महिलाओं के लिए समानता सुनिश्चित करना और पुराने ज़माने से चली आ रही पुरुषों की श्रेष्ठता की सोच से आगे बढ़ना था।
कोर्ट ने कहा कि कानून को समाज में हो रहे बदलावों के अनुसार बदलना चाहिए। कोर्ट ने तर्क दिया कि शादीशुदा महिलाओं और शादी जैसे रिश्तों में रहने वाली महिलाओं के बीच अंतर करने का घरेलू क्रूरता को रोकने के मकसद से कोई तार्किक संबंध नहीं होगा और इसलिए, यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।
कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' लिव-इन रिश्तों में महिलाओं की पर्याप्त सुरक्षा करता है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि घरेलू हिंसा अधिनियम का दायरा व्यापक है और यह शादी जैसे रिश्तों को मान्यता देता है, लेकिन यह मुख्य रूप से दीवानी (सिविल) उपाय प्रदान करता है। इसके विपरीत, धारा 498A आपराधिक दायित्व तय करती है और इसलिए इसके लिए सबूत का स्तर ऊंचा होना ज़रूरी है।
बेंच ने अपनी व्याख्या को विशेष रूप से धारा 498A तक ही सीमित रखा और स्पष्ट किया कि इसका असर अन्य दंडात्मक प्रावधानों की व्याख्या पर अपने आप नहीं पड़ेगा।
कोर्ट ने 'अनेश कुमार बनाम बिहार राज्य' मामले में गिरफ्तारी के खिलाफ तय किए गए सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन करने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि ऐसे रिश्तों में क्रूरता के आरोपी किसी भी लिव-इन पार्टनर या रिश्तेदार को शुरुआती जांच के बिना गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए।
मामले के तथ्यों के आधार पर, बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला अभियोजन को रद्द करने के लिए उपयुक्त नहीं है और अपील को खारिज कर दिया। नूली और नूली के निर्देश पर वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद संजय एम नूली, अधिवक्ता आश्रितसाई तोर्गल और शिव स्वरूप के साथ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए।
प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता नवीन शर्मा, स्वाति भूषण शर्मा, एसके शर्मा, पायल गोला, हेतु अरोरा सेठी, ललित मोहिनी भट्ट, सिद्धार्थ अग्रवाल, राहुल जैन, कनक बथवाल और सानिध्य कुमार ने किया।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर और ऐश्वर्या भाटी के साथ-साथ वकील गुरमीत सिंह मक्कड़, बीके सतीजा, सीमा बेंगानी, राजेश्वरी शंकर, रमन यादव और आरुषि सिंह, एन विसाकामूर्ति, हिमांशु जैन, कुमारी आरती और सूर्य नाथ पांडे भी मामले में पेश हुए।
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें
Does Section 498A apply to live-in relationships? Supreme Court answers