

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि लिव-इन पार्टनर से शादी करने से इनकार करने और उसके बाद पार्टनर के आत्महत्या कर लेने को, अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता; बशर्ते कि ऐसा करने के पीछे जानबूझकर उकसाने का इरादा न हो या यह जानकारी न हो कि इनकार करने से पार्टनर आत्महत्या कर लेगा।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने महिला के पार्टनर, उसके माता-पिता, बहन और अन्य लोगों समेत छह आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता के आरोपों को अगर सच भी मान लिया जाए, तो भी उनसे यह साबित नहीं होता कि आरोपियों ने महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया था।
कोर्ट ने कहा, "हालातों पर लोग अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं और अगर ब्रेकअप के बाद कोई आत्महत्या कर लेता है, तो इसे हमेशा आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता। शादी से इनकार करने के पीछे महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का इरादा नहीं था, और न ही आरोपियों को यह पता था कि इनकार करने पर वह आत्महत्या कर लेगी।"
यह मामला 2022 में IPC की धारा 306 और धारा 34 (साझा इरादे के साथ आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतक महिला और मुख्य आरोपी बचपन के दोस्त थे, उनकी आपसी सहमति से रिलेशनशिप थी और वे करीब तीन महीने तक आरोपी के घर पर साथ रहे थे।
अभियोजन पक्ष ने यह भी बताया कि महिला के पार्टनर ने शादी का प्रस्ताव रखा था, जिसे शुरू में महिला और उसके परिवार ने मान लिया था।
हालांकि, बाद में आरोपी के दोस्त ने महिला के बारे में बुरा-भला कहा और आरोपी की बहन के होने वाले पति ने शादी का विरोध किया। यह भी आरोप लगाया गया कि आरोपी के माता-पिता, बहन और अन्य लोगों ने उस पर रिश्ता खत्म करने का दबाव डाला।
कोर्ट ने गौर किया कि महिला ने अपनी बड़ी बहन को फोन पर बताया था कि मुख्य आरोपी ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया है और अगर अगले दिन शादी नहीं हुई तो वह अपनी जान दे देगी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इसके बाद आरोपी के घर पर बहस हुई, जिसके बाद महिला ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और आत्महत्या कर ली।
आरोपी ने मामले से बरी होने की मांग की थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2024 में इस अर्जी को खारिज कर दिया।
तेलंगाना हाई कोर्ट ने भी फरवरी 2026 में उनकी रिवीजन याचिका खारिज कर दी और कहा कि विवादित तथ्यों के लिए पूरे ट्रायल की ज़रूरत है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि आरोपी का इरादा महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का था।
कोर्ट ने कहा, "हमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे लगे कि आरोपी/अपीलकर्ताओं ने महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया हो। न तो ऐसा कोई इरादा था और न ही इसे आत्महत्या के लिए उकसाना कहा जा सकता है।"
इसके बाद कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
शिकायतकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अपर्णा भट और एडवोकेट यश एस विजय, शिखर अग्रवाल, जोशुआ टॉम थॉमस और सारांश खंडेलवाल पेश हुए। प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता देविना सहगल, यथार्थ कंसल, श्रीकांत वर्मा मुदुनुरु, सैयद अहमद सऊद, मोहम्मद परवेज डबास, मीर मुकर्रम अली, दानिश अहमद सैयद, उज़मी जमील हुसैन और मोहम्मद शाहिब पेश हुए।
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Refusing to marry live-in partner does not by itself amount to abetment of suicide: Supreme Court