चुनाव में जीत के लिए 'दुआ' मांगना धर्म के नाम पर वोट मांगना नहीं है: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फ़ैसला बरकरार रखा

अदालत ने 2024 के महाराष्ट्र चुनावों में मालेगांव सेंट्रल विधानसभा क्षेत्र से AIMIM के मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक के चुनाव को बरकरार रखा।
Supreme Court of India
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सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर को बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि चुनाव में जीत के लिए दुआ (मुस्लिम प्रार्थना) करना न तो अनुचित प्रभाव डालने जैसा है और न ही धर्म के नाम पर वोट मांगना है [शान-ए-हिंद बनाम मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक]।

जस्टिस विक्रम नाथ, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और संदीप मेहता की बेंच ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 8 जून के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 2024 के महाराष्ट्र चुनावों में मालेगाँव सेंट्रल विधानसभा क्षेत्र से AIMIM विधायक मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक के चुनाव को सही ठहराया गया था।

यह विवाद मालेगांव सेंट्रल में नवंबर 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ। AIMIM उम्मीदवार खलीक को 1,09,563 वोट मिले, जबकि शेख आसिफ शेख रशीद को 1,09,491 वोट मिले; इस तरह जीत का अंतर 72 वोटों का रहा। समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले शान-ए-हिंद निहाल अहमद को 9,624 वोट मिले।

इसके बाद रशीद ने बॉम्बे हाई कोर्ट में खलीक के चुनाव को चुनौती दी और आरोप लगाया कि प्रचार के दौरान गलत तरीकों का इस्तेमाल किया गया था।

हाई कोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज कर दी। इसके बाद अहमद ने उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

चुनौती का एक बड़ा हिस्सा प्रचार के दौरान धार्मिक बातों के इस्तेमाल से जुड़ा था।

चुनाव याचिका में आरोप लगाया गया कि खलीक, जिन्हें एक इमाम बताया गया था, ने प्रचार के दौरान बार-बार इस्लाम और इस्लामी धार्मिक ग्रंथों का ज़िक्र किया। इसमें 16 अक्टूबर 2024 को मालेगांव की जामा मस्जिद में हुए 'दर्स-ए-कुरान' का ज़िक्र किया गया, जहाँ आरोप है कि खलीक ने महिला को शासक चुनने के खिलाफ बात की थी।

चुनौती में प्रचार के दौरान कई बार "दुआ" करने का भी ज़िक्र किया गया। अपील में गांधीनगर चौक, फतेह मैदान और नूरी टॉवर मछली बाज़ार में की गई प्रार्थनाओं का हवाला दिया गया, जहाँ ऐसा किया गया था।

अन्य आरोप प्रचार भाषणों और पर्चों से जुड़े थे जिनमें खलीक को मुसलमानों का प्रतिनिधि और "इस्लाम की आवाज़" के तौर पर पेश किया गया था। एक भाषण में आरोप लगाया गया कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर नंबर पांच का बटन दबाने को इस्लाम के पांच स्तंभों और दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ने से जोड़ा गया था।

यह भी आरोप लगाया गया कि एक प्रचारक ने मुस्लिम मतदाताओं से अल्लाह की कसम खाकर यह कहने को कहा कि वे AIMIM के चुनाव चिह्न 'पतंग' को वोट देंगे।

चुनाव याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि 1,082 मृत लोगों के नाम वोटर लिस्ट में बने हुए थे और उन्हें वोट देने वालों के तौर पर दिखाया गया था; चुनौती देने वाले के अनुसार, जीत का अंतर कम होने के कारण यह बात अहम थी।

इसके बावजूद बॉम्बे हाई कोर्ट ने चुनाव याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव में जीत के लिए दुआ करना धर्म के नाम पर वोट मांगने जैसा नहीं है।

हाई कोर्ट ने कहा, "जैसा कि ऊपर बताया गया है, दुआ (प्रार्थना) करने और उसके जवाब में 'आमीन' कहने को कोई वादा नहीं माना जा सकता। दुआ असल में भगवान के साथ भक्त की बातचीत का एक तरीका है, इसलिए चुनाव में सफलता के लिए प्रार्थना करना न तो अनुचित प्रभाव डालने जैसा है और न ही धर्म के नाम पर वोट मांगने जैसा। प्रतिवादी नंबर 1 पर अपनी बीमारी का हवाला देकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश करने का आरोप लगाया जा सकता था। लेकिन यह बात इस मामले से पूरी तरह अलग है।"

सुप्रीम कोर्ट में यह अपील समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शान-ए-हिंद निहाल अहमद ने दायर की थी।

उन्होंने तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने चुनाव प्रचार के पूरे मटीरियल पर विचार करने के बजाय अलग-अलग भाषणों की गलत तरीके से जांच की थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

अहमद की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी पेश हुए।

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Saying 'dua' for poll victory is not soliciting votes in the name of religion: Supreme Court upholds HC verdict

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