

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। इस याचिका में देश भर के स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान संविधान की प्रस्तावना का रोज़ पाठ करने के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी [धीरज कुमार बनाम भारत संघ और अन्य]।
जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। बेंच ने कहा कि प्रस्तावना पहले से ही स्कूली पाठ्यक्रम का अहम हिस्सा है और देश भर में छठी कक्षा से ही छात्रों को यह पढ़ाई जाती है।
यह PIL दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजधानी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर धीरज कुमार ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड रोहित कुमार के ज़रिए दायर की थी।
याचिकाकर्ता ने 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (अदालत का आदेश) की मांग की थी, ताकि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) को स्कूली छात्रों के बीच संवैधानिक साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए एक देशव्यापी पॉलिसी फ़्रेमवर्क बनाने का निर्देश दिया जा सके।
याचिका में कहा गया कि सुबह की प्रार्थना के दौरान राष्ट्रगान गाने की तरह ही संविधान की प्रस्तावना (Preamble) को नियमित और सामूहिक रूप से पढ़ने से कम उम्र से ही न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे बुनियादी मूल्य विकसित होंगे। इससे अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के मौलिक अधिकार और अनुच्छेद 51A(a) के तहत मौलिक कर्तव्यों को बढ़ावा मिलेगा।
इस मांग के समर्थन में, याचिका में राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकारों द्वारा जारी सर्कुलर का हवाला दिया गया। इन सर्कुलर में पहले ही सरकारी और उनसे जुड़े स्कूलों को निर्देश दिया गया था कि वे सुबह की असेंबली के दौरान छात्रों से प्रस्तावना का पाठ करवाएं।
याचिका में CBSE के मई 2025 के सर्कुलर का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें असेंबली में रोज़ाना सकारात्मक बातें (positive affirmations) कहने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। इसमें तर्क दिया गया कि प्रस्तावना का पाठ करना नागरिक चेतना का सबसे बड़ा सकारात्मक संकल्प है।
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Supreme Court dismisses plea for recitation of Preamble during morning assembly in schools