

'वन नेशन, वन इलेक्शन' बिलों की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ बैठक, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) पार्टी के सांसद, JPC सदस्य और सीनियर एडवोकेट पी. विल्सन के प्रस्ताव पर आयोजित की गई थी।
मौजूदा जजों के ऐसे कानून पर चर्चा करने की उचितता पर आपत्तियों के बीच प्रस्तावित बैठक रद्द कर दी गई, जिस पर बाद में कोर्ट में न्यायिक समीक्षा के लिए सुनवाई हो सकती है।
हालांकि, विल्सन ने अब ऐसी बैठक के प्रस्ताव का बचाव किया है।
विल्सन ने अपने बयान में कहा, "दुर्भाग्य से, इस बैठक को लेकर राजनीतिक आपत्तियों और निहित स्वार्थों के कारण पैदा हुए अनावश्यक और दुर्भाग्यपूर्ण हालात की वजह से बैठक रद्द करने का फैसला किया गया।"
JPC की अध्यक्षता भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद पीपी चौधरी कर रहे हैं। इसने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों के साथ बातचीत का प्रस्ताव रखा था।
यह बैठक संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर JPC के विचार-विमर्श का हिस्सा थी। इन विधेयकों का मकसद लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था करना है।
सुप्रीम कोर्ट शुरू में इस बातचीत के लिए सहमत हो गया था और JPC व CJI के कार्यालयों के बीच प्रस्तावित प्रतिनिधिमंडल को लेकर बातचीत भी हुई थी। बाद में 1 अक्टूबर को बैठक रद्द कर दी गई, क्योंकि मौजूदा जजों के ऐसे कानून पर चर्चा करने को लेकर चिंताएं जताई गई थीं, जो भविष्य में कोर्ट के सामने आ सकता है।
खास बात यह है कि इस प्रस्ताव की राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी और इसकी संवैधानिक उचितता पर सवाल उठाए थे।
सिब्बल ने कहा, "यह संविधान का मज़ाक है।"
हालांकि, विल्सन ने कहा है कि उनके प्रस्ताव को 'एक देश, एक चुनाव' के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। विल्सन ने कहा कि DMK और उसके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने लगातार इस प्रस्ताव का विरोध किया है।
उन्होंने तर्क दिया कि यह सुझाव JPC की व्यापक बातचीत प्रक्रिया के तहत दिया गया था, जिसमें विधायक, राज्य विधानसभाओं के स्पीकर, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, संवैधानिक विशेषज्ञ, प्रशासक और भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश शामिल रहे हैं।
विल्सन के अनुसार, इसका मकसद प्रस्तावित सुधार के संवैधानिक और व्यावहारिक असर पर न्यायपालिका का संस्थागत नज़रिया जानना था, न कि बिलों के लिए न्यायिक मंज़ूरी लेना।
उन्होंने इस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसी बातचीत मूल रूप से असंवैधानिक है, और कहा:
"अगर कोई न्यायिक मर्यादा के आधार पर प्रस्तावित बातचीत से असहमत है, तो यह एक जायज़ संस्थागत रुख है जिस पर सम्मानपूर्वक विचार किया जा सकता है। लेकिन इससे आगे बढ़कर यह कहना कि किसी संसदीय समिति का जजों से उनकी व्यक्तिगत हैसियत में राय मांगना ही असंवैधानिक है, एक बिल्कुल अलग बात है। इसमें संवैधानिक रोक कहाँ है?"
विल्सन ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस बातचीत से शक्तियों के बंटवारे का उल्लंघन होगा।
विल्सन ने कहा, "शक्तियों के बंटवारे का मतलब यह नहीं है कि राज्य के तीनों अंग अलग-अलग खानों में काम करें, कभी एक-दूसरे से बात न करें या कभी संस्थागत नज़रिए का आदान-प्रदान न करें। संविधान तीन अलग-अलग द्वीप नहीं बनाता है।"
उन्होंने तर्क दिया कि विधायी प्रक्रिया के दौरान जजों से अनौपचारिक राय मांगना, सुप्रीम कोर्ट से बिलों की संवैधानिक वैधता पर फैसला करने के लिए कहने से अलग है।
विल्सन ने मौजूदा जजों के साथ पिछली संसदीय बातचीत का हवाला दिया, जिसमें वर्चुअल कोर्ट और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण से जुड़ी बैठकें शामिल थीं। उन्होंने 1948 में संविधान के मसौदे को तैयार करने के दौरान जजों के साथ हुई बातचीत का भी ज़िक्र किया।
विल्सन ने कहा कि वह CJI और अन्य जजों के बातचीत न करने के फैसले का सम्मान करते हैं। साथ ही, उन्होंने कहा कि उनका प्रस्ताव संवैधानिक रूप से सही था।
विल्सन ने कहा, "इसलिए हमारी कोशिश नेक नीयत से और एक मकसद के साथ की गई थी: हर ज़रूरी नज़रिए को सुनना, हर जायज़ चिंता पर ध्यान देना और यह पक्का करना कि अगर संवैधानिक संशोधन लागू होता है, तो उस पर सावधानी से विचार किया गया हो और वह संवैधानिक रूप से वैध हो। मेरा मानना है कि यही इस समिति का काम है।"
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One Nation, One Election: DMK's P Wilson defends JPC proposal to meet Supreme Court judges