

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आज पश्चिम बंगाल सरकार के सितंबर महीने के उस परिसीमन नोटिफिकेशन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें कोलकाता नगर निगम (KMC) के वार्डों की सीमाओं को फिर से तय करके उनकी संख्या 144 से बढ़ाकर 209 करने की बात कही गई है [दीपु दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य]।
न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें परिसीमन प्रक्रिया को मनमाना और प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण बताया गया था। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि इसे संभवतः सत्तारूढ़ दल (भाजपा) को चुनावी लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
याचिकाकर्ता ने अंतरिम राहत के तौर पर अदालत से आग्रह किया था कि सितंबर में जारी अधिसूचना पर रोक लगाई जाए। साथ ही, उन्होंने मांग की थी कि जब तक परिसीमन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग को नए सिरे से तय किए गए वार्डों के आधार पर KMC (कोलकाता नगर निगम) चुनाव कराने से रोका जाए।
अदालत ने आज याचिकाकर्ता को ऐसी कोई भी अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों पर तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करे।
यह याचिका दीपू दास ने दायर की है, जो एक पूर्व पार्षद हैं। उन्होंने उस समय यह पद संभाला था जब राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) [CPI(M)] की सरकार थी।
याचिका में राज्य को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह 11 सितंबर, 2026 की उस अधिसूचना को रद्द करे, जिसके तहत कोलकाता के मूल 144 वार्डों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण (परिसीमन) किया गया था। इसके परिणामस्वरूप वार्डों की संख्या बढ़कर 209 हो गई, जबकि आरोप है कि ऐसा करते समय उचित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
याचिका के अनुसार, जब 209 वार्डों की प्रस्तावित सीमाओं पर आपत्तियां दर्ज कराने की बात आई, तो अन्य पक्षों को अपने सुझाव या आपत्तियां देने के लिए बहुत कम समय दिया गया, या फिर उनकी आपत्तियों पर कोई विचार ही नहीं किया गया।
याचिका में कहा गया है, "कोलकाता नगर निगम के चुनावों में भाग लेने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों की स्पष्ट आपत्तियों के बावजूद, अधिकारियों ने इन आपत्तियों पर विचार नहीं किया और न ही परिसीमन के पीछे का कोई तर्कसंगत आधार बताया। इसलिए, यह अधिसूचना मनमानी और भेदभावपूर्ण है। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है और इसमें उचित सोच-विचार का अभाव है, साथ ही यह वैधानिक शक्तियों के अनुचित इस्तेमाल का मामला है।"
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पहले से मौजूद कई वार्डों की सीमाओं में इस तरह बदलाव करने का प्रस्ताव दिया गया, जिससे मतदाताओं की संख्या और वार्डों के आकार में पूरी तरह से फेरबदल हो गया।
याचिका में नए सिरे से तय किए गए वार्डों के आकार में भारी असमानता का भी आरोप लगाया गया है। याचिका में वार्ड-वार आंकड़ों का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार प्रति वार्ड औसतन 15,149 मतदाता होने चाहिए। हालांकि, वास्तव में ये आंकड़े पूरी तरह से असंतुलित हैं। सबसे छोटे वार्ड, यानी वार्ड नंबर 57 में केवल 5,655 मतदाता हैं, जबकि सबसे बड़े वार्ड, यानी वार्ड नंबर 66 में 28,000 से अधिक मतदाता हैं। इस तरह, दूसरा वार्ड पहले वाले वार्ड की तुलना में लगभग पांच गुना बड़ा हो गया है।
याचिका में कहा गया है, "यह असमानता केवल दो चरम सीमाओं तक ही सीमित नहीं है; लगभग 23 वार्डों में मतदाताओं की संख्या 12,000 से कम है, जबकि वार्ड 45, 56, 66, 121, 128 और 175 सहित सात वार्डों में मतदाताओं की संख्या 20,000 से अधिक है।"
अन्य तर्कों के अलावा, याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे राजनीतिक मकसद हैं। उनका तर्क है कि जिन इलाकों में अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को अधिक वोट मिले थे, वहां के वार्डों को छोटा कर दिया गया; जबकि जिन इलाकों में BJP का समर्थन कम था, उन्हें बड़े वार्डों में शामिल कर दिया गया।
याचिका में कहा गया है, "ऐसा लगता है कि यह प्रक्रिया पिछले चुनावी नतीजों से प्रभावित है, जिसका मकसद सत्ताधारी राजनीतिक दल को अनुचित लाभ पहुंचाना है। इस तरह, कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 की धारा 601 के तहत मिली वैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल बाहरी कारणों से किया गया है, और इसमें संबंधित जनसांख्यिकीय (demographic) तथा भौगोलिक आंकड़ों पर उचित विचार नहीं किया गया है।"
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने अदालत को बताया कि परिसीमन (delimitation) की प्रक्रिया तब हुई जब KMC का कोई निर्वाचित बोर्ड मौजूद नहीं था। सत्ता परिवर्तन के कारण पिछला बोर्ड भंग कर दिया गया था, और यह प्रक्रिया नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) की सिफारिश पर पूरी की गई।
उन्होंने कहा कि नगर आयुक्त, जो एक अधीनस्थ कर्मचारी हैं, वे KMC की भूमिका नहीं निभा सकते।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मतदाताओं की संख्या में कोई समानता नहीं लाई जा सकी, क्योंकि वार्डों का पुनर्निर्धारण (redrawing) बिना सोचे-समझे, यांत्रिक तरीके से किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि भविष्य में वोट हासिल करने के लिए मौजूदा सत्ताधारी दल ने ही पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया है।
वरिष्ठ वकील ने बताया कि परिसीमन का प्रस्ताव देने वाली अधिसूचना जारी करते समय, कोलकाता नगर अधिनियम की धारा 5(2) में आवश्यक संशोधन भी नहीं किया गया था, ताकि नए 209 वार्ड पार्षदों को इसमें शामिल किया जा सके।
उन्होंने आगे कहा कि बाद में विधानसभा ने बिना किसी वास्तविक विचार-विमर्श के जल्दबाजी में एक संशोधन विधेयक पारित कर दिया।
KMC की ओर से पेश महाधिवक्ता (Advocate General) सुरोजित नाथ मित्रा ने इन तर्कों का खंडन किया। याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए, उन्होंने कहा कि इनमें से किसी भी मुद्दे पर विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि याचिकाकर्ता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं हुआ है।
उन्होंने आगे कहा कि वार्डों के परिसीमन की प्रक्रिया में सभी आवश्यक नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।
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Calcutta High Court refuses to stay delimitation of Kolkata Municipal Wards